दिलचस्प बात यह है कि, हाल ही में पाए गए कई अन्य वायरसों की तरह भारत में मंकीपॉक्स का पहला मामला भी केरल में ही सामने आया है। दरअसल यह केरल में रोग निगरानी प्रणाली के मजबूत होने को इंगित करता है, जो दुर्लभ संचरण का भी पता लगाने के लिए पर्याप्त संवेदनशील है।
पिछले 14 जुलाई को केरल में मंकीपॉक्स का मरीज मिला। यह देश में मंकीपॉक्स का पहला मामला था। कुछ दिनों बाद वहीं दूसरा मरीज भी मिला। इससे पहले आज तक कभी भारत में मंकीपॉक्स का विषाणु या मरीज नहीं मिला था। कोविड महामारी के अनुभव की वजह से लोग चिंतित हैं कि कहीं मंकीपॉक्स एक महामारी और बड़ी समस्या तो नहीं बन जाएगा? लेकिन मंकीपॉक्स के मरीज मिलने को देश के सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ आश्चर्य या बड़ी चिंता के रूप में नहीं देख रहे। दरअसल, नई बीमारियों और विशेष रूप से जूनोटिक रोगों (जो जानवरों से इंसानों में फैलती हैं) का उभरना अब आम होता जा रहा है।
पिछले आठ दशकों में पूरी दुनिया में लगभग 350 नए रोग सामने आए हैं, और उनमें से दो-तिहाई बीमारियां जानवरों से इंसानों में फैलने वाली रही हैं। मंकीपॉक्स वायरस के प्रसार के लिए प्रभावित व्यक्ति के साथ, सीधे त्वचा से त्वचा का संपर्क होना जरूरी है। मंकीपॉक्स के लिए कुछ दवाएं और टीके भी उपलब्ध हैं। हालांकि, ये दवाएं और टीके सभी देशों में उपलब्ध नहीं हैं। आम जनता को मंकीपॉक्स टीकाकरण की जरूरत भी नहीं है। अगर व्यक्तिगत स्तर पर बात करें, तो मंकीपॉक्स काफी हद तक एक आत्म-सीमित बीमारी है, और लोग बिना किसी इलाज के ठीक हो जाते हैं। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि गैर-स्थानिक देशों (अफ्रीका के बाहर) में लगभग 12,500 मामले सामने आए हैं, लेकिन इन देशों में अब तक किसी की मौत नहीं हुई है।
Date – 22.07.2022
Pennde By – Manisha