भारत के प्रमुख पर्वों में से एक है मकर संक्रांति

By New31 Uttarakhand

भारत के प्रमुख पर्वों में से एक है मकर संक्रांति बता दें की ये त्यौहार पूरे भारत में भिन्न रूपों में मनाया जाता है। पौष मास में जिस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है उस दिन इस पर्व को मनाया जाता है। वहीं उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में मकर संक्रांति को ‘घुघुतिया’ के तौर पर धूमधाम से मनाया जाता है। एक दिन पहले आटे को गुड़ मिले पानी में गूंथा जाता है। देवनागरी लिपी के ‘चार’, ढाल-तलवार और डमरू सरीखे कई तरह की कलाकृतियां बनाकर पकवान बनाए जाते हैं। इन सबको एक संतरे समेत माला में पिरोया जाता है। इसे पहनकर बच्चे अगले दिन घुघुतिया पर सुबह नहा-धोकर कौओं को खाने का न्योता देते हैं। बच्चे कुछ इस तरह कौओं को बुलाते हैंःकाले कौआ काले, घुघुति माला खा ले! साथ ही बागेश्वर के सरयू नदी के पार और वार एक दिन आगे-पीछे इसे मनाने की प्राचीन परंपरा है। सरयू पार यानी दानपुर की तरफ के लोग पौष मास के आखिरी दिन घुघुत तैयार करते हैं और इसके अगले दिन कौओं को बुलाते हैं। सरयू वार यानी कौसानी-अल्मोड़ा के लोग माघ मास की संक्रांति यानी एक दिन बाद पकवान तैयार करते हैं। इसके अगले दिन घरों के बच्चे ‘काले कौआ-काले कौआ’ कहकर पर्व मनाते हैं। जानकार बताते हैं कि कुमाऊं में प्राचीन समय की राज व्यवस्था की वजह से यह एक दिन का अंतर देखने को मिलता है।कुमाऊं में उत्तरायणी के दिन सरयू, रामगंगा, आदि नदियों में कड़ाके की सर्दी के बावजूद लोग सुबह स्नान-ध्यान कर सूर्य का अर्घ्य चढ़ाकर आराधना करते हैं। उत्तरैणी कौतिक का सबसे बड़ा मेला बागेश्वर के सरयू बगड़ पर लगता है। एक समय यहां हुड़के की थाप पर झोड़े चांचरी, भगनौल और छपेली गाने की परंपरा थी।अब समय की बदलती मांग के चलते प्रफेशनल कलाकर मंच पर सांस्कृतिक प्रोग्राम करते हैं।

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