दिल्ली के मालवीय नगर में हुआ भीषण अग्निकांड सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि सिस्टम की बड़ी नाकामी की दर्दनाक कहानी बनकर सामने आया है। इस हादसे में 21 लोगों की जान चली गई, जबकि 40 से ज्यादा लोगों को रेस्क्यू कर सुरक्षित बाहर निकाला गया। जांच में सामने आया है कि जिस इमारत में आग लगी, उसे कागजों में केवल 6 कमरों वाले बीएंडबी (Bed & Breakfast) के रूप में अनुमति मिली थी, लेकिन हकीकत में वहां 25 कमरे संचालित किए जा रहे थे। इतना ही नहीं, इमारत के पास वैध फायर एनओसी भी नहीं थी। भवन में सिर्फ एक एंट्री और एग्जिट रास्ता था, जबकि कई खिड़कियां स्थायी रूप से बंद कर दी गई थीं। आग लगने के बाद धुआं तेजी से पूरे भवन में फैल गया और अंदर मौजूद लोगों के पास बाहर निकलने का कोई सुरक्षित रास्ता नहीं बचा। कुछ ही मिनटों में यह इमारत लोगों के लिए मौत का जाल बन गई। हादसे के बाद यह सवाल लगातार उठ रहा है कि आखिर इतनी गंभीर सुरक्षा खामियों के बावजूद यह होटल वर्षों तक कैसे संचालित होता रहा।
रिपोर्ट्स के मुताबिक दिल्ली हाईकोर्ट ने महीनों पहले होटलों और गेस्ट हाउसों में फायर सेफ्टी नियमों को लेकर सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए थे, लेकिन जमीनी स्तर पर उन निर्देशों का पालन नहीं हुआ। शुरुआती जांच में आग लगने की वजह तकनीकी खराबी, एसी फॉल्ट या किचन क्षेत्र से जुड़ी किसी समस्या को माना जा रहा है, हालांकि जांच अभी जारी है। इस पूरे हादसे की सबसे दर्दनाक कहानी अग्रवाल परिवार की है। बताया जा रहा है कि परिवार के सदस्य गुरुग्राम से अपने अस्पताल में भर्ती बुजुर्ग पिता से मिलने दिल्ली आए थे, लेकिन उन्हें क्या पता था कि यह मुलाकात उनकी आखिरी यात्रा बन जाएगी। आग की भयावह लपटों में एक ही परिवार के 8 सदस्य जिंदा जल गए। सबसे मार्मिक बात यह है कि अस्पताल में भर्ती बुजुर्ग पिता को अब तक इस भयानक सच की जानकारी नहीं दी गई है कि उनके परिवार के कई सदस्य अब इस दुनिया में नहीं रहे। यह हादसा सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि उन प्रशासनिक एजेंसियों और सुरक्षा व्यवस्थाओं पर बड़ा सवाल है जिनकी जिम्मेदारी ऐसे हादसों को रोकने की होती है। अब पूरा देश यही पूछ रहा है कि आखिर इस लापरवाही का जिम्मेदार कौन है और क्या भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कोई ठोस कदम उठाए जाएंगे।