इलाज के नाम पर लापरवाही… और गरीब की जिंदगी की कोई कीमत नहीं? Haldwani से सामने आया ये मामला सिर्फ एक मौत नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर बड़ा सवाल है। रामनगर के चिलकिया क्षेत्र के ग्राम जस्सा गांजा निवासी राजपाल कश्यप, जो मजदूरी कर अपने परिवार का पेट पालते थे, 28 मार्च को काम के दौरान आंख में कंकरी लगने से घायल हो गए थे। इलाज के लिए उन्हें हल्द्वानी के एक निजी नेत्र अस्पताल में दिखाया गया, जहां डॉक्टरों ने सर्जरी की सलाह दी और कहा कि ऑपरेशन नहीं कराया तो आंख खराब हो सकती है। परिजनों ने भरोसा किया, सर्जरी कराई, दवाइयां चलीं और कई बार जांच के लिए बुलाया गया। लेकिन फिर 15 अप्रैल को दोबारा ऑपरेशन की बात कहकर शाम करीब साढ़े पांच बजे से रात 9:40 बजे तक सर्जरी की गई। इसी दौरान हालात बिगड़ गए। परिजनों के मुताबिक ऑपरेशन थिएटर से डॉक्टर और स्टाफ तीन बार बाहर आए और हर बार अलग-अलग वजह बताई—पहले बीपी बढ़ने की बात, फिर हालत गंभीर बताई गई और आखिर में दूसरे अस्पताल ले जाने को कहा गया। लेकिन जब तक परिजन कुछ समझ पाते, दूसरे अस्पताल से मौत की खबर मिल गई। इसके बाद परिवार 19 घंटे तक अस्पताल और कोतवाली के चक्कर काटता रहा, लेकिन कार्रवाई के बजाय समझौते का दबाव बनाया जाता रहा।
गांव की महिलाएं तक पिकअप में भरकर कोतवाली पहुंचीं और बच्चों के भविष्य की गुहार लगाती रहीं, तब जाकर पोस्टमार्टम के लिए सहमति बनी। राजपाल कश्यप… एक ऐसा शख्स जो अपने परिवार की रीढ़ था आज अपने पीछे 8 मासूम बच्चों को बेसहारा छोड़ गया है—सबसे बड़ा बेटा महज 11 साल का। माता-पिता के गुजरने के बाद राजपाल ने ही अपने भाइयों को संभाला, उनकी शादियां कराईं और पूरे परिवार की जिम्मेदारी उठाई। लेकिन आज वही परिवार टूट गया है। सवाल ये है कि क्या निजी अस्पतालों के लिए मरीज सिर्फ कमाई का जरिया बन चुके हैं? हल्द्वानी में पहले भी कई गंभीर मामले सामने आ चुके हैं—कभी जिंदा मरीज को मृत घोषित करना, कभी शव को बंधक बनाना, तो कभी इलाज के दौरान मौत और जांच रिपोर्ट का सालों तक गायब रहना। इसके बावजूद बड़े-बड़े नेता इन्हीं अस्पतालों का उद्घाटन करते नजर आते हैं। इस पूरे मामले में अब Nainital Health Department ने सीएमओ डॉ. एचसी पंत की अध्यक्षता में जांच टीम गठित कर दी है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी वही है—क्या इस बार सच्चाई सामने आएगी या फिर एक और गरीब की मौत कागजों में दबकर रह जाएगी?