सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को आरक्षण पर दिए ऐतिहासिक फैसले में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण के तहत वर्गीकरण की मंजूरी दे दी है। यानी मौजूदा कोटे के अंदर भी नया कोटा बनाया जा सकेगा। साथ ही कोर्ट ने एससी, एसटी वर्ग के आरक्षण में से क्रीमीलेयर को चिन्हित कर बाहर किए जाने की जरूरत पर बल दिया है। आपको बता दे गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट की सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 6-1 के बहुमत से दिए फैसले में कहा कि एससी, एसटी वर्ग के ही ज्यादा जरूरतमंदो को आरक्षण का लाभ देने के लिए राज्य एससी, एसटी वर्ग में उपवर्गीकरण कर सकता हैं। साथ ही सर्वोच्च अदालत ने बीस साल पुराने पांच न्यायाधीशों के ईवी चिनैया (2004) मामले में दी गई व्यवस्था को गलत ठहरा दिया है। हालांकि, कोर्ट का यह भी कहना था कि सब कैटेगिरी का आधार उचित होना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस बेला एम त्रिवेदी, जस्टिस पंकज मिथल, जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने ये फैसला सुनाया।
हालांकि कोर्ट ने ये भी कहा कि इसके लिए पर्याप्त प्रतिनिधित्व न होने और पिछड़ेपन का संकेत देने वाले आंकड़े एकत्र करने होंगे। वही फैसले का दूसरा पहलू क्रीमी लेयर है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में एससी एसटी वर्ग में क्रीमी लेयर की पहचान कर उसे आरक्षण के लाभ से बाहर करने की बात कही है। दरअसल अभी तक क्रीमी लेयर का सिद्धांत सिर्फ ओबीसी आरक्षण में ही लागू है। और एससी-एसटी वर्ग के आरक्षण में क्रीमी लेयर का सिद्धांत लागू नहीं है, लेकिन इस फैसले के बाद एससी एसटी वर्ग में भी क्रीमी लेयर की पहचान करने और उसे बाहर करने की बात कही गई है, ताकि वास्तविक जरूरतमंदों को ही आरक्षण का लाभ मिले।
क्या है कोटा के भीतर कोटा का मतलब?
दरअसल कोटा के भीतर कोटा का मतलब है आरक्षण के पहले से आवंटित प्रतिशत के भीतर एक अलग आरक्षण व्यवस्था लागू करना। ये मुख्य रूप से ये सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है कि आरक्षण का लाभ समाज के सबसे पिछड़े और जरूरतमंद समूहों तक पहुंचे, जो आरक्षण प्रणाली के तहत भी उपेक्षित रह जाते हैं। साथ ही इसका उद्देश्य आरक्षण के बड़े समूहों के भीतर छोटे, कमजोर वर्गों का अधिकार सुनिश्चित करना है ताकि वे भी आरक्षण का लाभ उठा सकें। उदाहरण के लिए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के भीतर अलग-अलग समूहों को आरक्षण दिया जा सकता है ताकि उन समूहों को ज्यादा प्रतिनिधित्व और लाभ मिल सके जो सामाजिक या आर्थिक रूप से ज्यादा वंचित हैं।