उत्तराखंड में विकास नहीं, सिर्फ ‘जुगाड़ मॉडल’ चल रहा है! सड़क टूटे तो मिट्टी डाल दो, फिर फोटो खिंचवा लो… लेकिन आखिर कब तक?””चारधाम ऑल वेदर रोड”… “विश्वस्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर”… “डबल इंजन का विकास”…ये शब्द सुनने में जितने बड़े लगते हैं, उत्तराखंड की सड़कों की हकीकत उतनी ही डरावनी है। ऐसा लगता है जैसे यहां सड़कें बनाई नहीं जातीं, बल्कि हर मानसून के भरोसे छोड़ दी जाती हैं। और अगर सड़क बन भी जाए, तो उसकी उम्र इतनी कम होती है कि कुछ ही बारिशों में डामर उखड़कर हाथ में आने लगता है।ताजा तस्वीर उत्तरकाशी के भटवाड़ी स्थित पापड़गाड से सामने आई है, जहां गंगोत्री हाईवे पर अचानक भू-धंसाव शुरू हो गया। सुबह सड़क पर सिर्फ एक हल्की दरार थी, लेकिन कुछ ही घंटों में वही दरार 50 मीटर तक फैल गई।
हालात इतने खराब हो गए कि चार घंटे तक हाईवे पूरी तरह बंद रहा। लोग फंसे रहे, सिर्फ बाइक सवार किसी तरह निकल पाए।सबसे हैरानी की बात यह है कि यही जगह पिछले साल भी धंसी थी। तब हाईवे तीन दिन तक बंद रहा था, आवाजाही ठप हो गई थी और प्रशासन को आपदा प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचने में भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। स्थानीय लोगों ने तब भी स्थायी समाधान की मांग की थी। लेकिन एक साल बाद तस्वीर वही है—न मजबूत सुरक्षा दीवार, न ढलान को स्थिर करने का काम, न कोई स्थायी इंजीनियरिंग समाधान।इस बार भी समाधान क्या निकला? दरारों में मिट्टी भर दो और ट्रैफिक चालू कर दो।क्या करोड़ों रुपये की परियोजनाओं का मतलब सिर्फ इतना रह गया है कि सड़क टूटे, मिट्टी डालो, फोटो खिंचवाओ और अगले मानसून तक इंतजार करो?यह सिर्फ सड़क का मामला नहीं है। ऊपर बसा क्यार्क गांव भी खतरे की जद में है। हल्की बारिश या भारी वाहनों का दबाव कभी भी बड़े भू-धंसाव में बदल सकता है। अगर ऐसा हुआ तो सिर्फ हाईवे नहीं, लोगों के घर और जिंदगी भी दांव पर लग जाएगी।चारधाम यात्रा के दौरान लाखों श्रद्धालु इसी मार्ग से गुजरते हैं। सेना की आवाजाही, स्थानीय लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी और आपदा राहत—सब कुछ इसी सड़क पर निर्भर है। फिर भी हर साल वही कहानी दोहराई जाती है—पहले सड़क टूटती है, फिर मरम्मत होती है, फिर बारिश आती है और फिर सड़क टूट जाती है।सवाल सीधा है—क्या उत्तराखंड में विकास सिर्फ विज्ञापनों, भाषणों और उद्घाटनों तक सीमित है?अगर हर मानसून में सड़कें धंसें, पहाड़ दरकें और गांव खतरे में आ जाएं, तो जनता पूछेगी ही—आखिर टैक्स का पैसा सड़क बनाने में लगा या सिर्फ दावों और पोस्टरों में?कब तक ‘विकास’ के नाम पर उत्तराखंड की जनता को सिर्फ लॉलीपॉप मिलता रहेगा? और कब मिलेगा ऐसा इंफ्रास्ट्रक्चर जो पहली बारिश नहीं, आने वाली कई पीढ़ियों तक टिक सके?