दिल्ली की एक अदालत ने दिल्ली में 2019 के जामिया हिंसा मामले में शरजील इमाम, सफूरा जरगर, आसिफ इकबाल तन्हा और आठ अन्य को डिस्चार्ज करते हुए शनिवार को कहा कि पुलिस “वास्तविक अपराधियों” को पकड़ने में असमर्थ रही और “निश्चित रूप से उन्हें बलि का बकरा बनाया गया।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अरुल वर्मा ने गलत तरीके से चार्जशीट दायर करने के लिए अभियोजन पक्ष की खिंचाई करते हुए कहा कि पुलिस ने विरोध करने वाली भीड़ में से कुछ लोगों को आरोपी और अन्य को पुलिस गवाह के रूप में पेश करने के लिए “मनमाने ढंग से चुना” है।

अदालत ने कहा कि यह “चेरी पिकिंग” निष्पक्षता के सिद्धांत के लिए हानिकारक है। अदालत ने देखा कि बिना किसी प्रत्यक्ष कृत्य के सिर्फ विरोध प्रदर्शन की जगह पर उपस्थिति रहने से उन्हें आरोपी के रूप में नहीं माना जा सकता। न्यायाधीश ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने उनके खिलाफ लापरवाही से काम लिया। कोर्ट ने कहा कि ऐसे व्यक्तियों को लंबे समय तक चलने वाले मुकदमे की कठोरता से गुजरने देना हमारे देश की आपराधिक न्याय प्रणाली के लिए अच्छा नहीं है।