लेखिका गीतांजलि श्री के उपन्यास ‘टूंब आफ सैंड’ को अंतरराष्ट्रीय बुकर प्राइज मिला है। प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार जीतने वाली किसी भी भारतीय भाषा की यह पहली पुस्तक बन गई है। गीतांजलि श्री की पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद डेजी राकवेल ने किया है। उनका उपन्यास टूंब आफ सैंड, भारत के विभाजन से जुड़ी पारिवारिक गाथा है, जो अपने पति की मृत्यु के बाद एक 80 साल की महिला का अनुकरण करती हैं। बता दें कि 50,000 पाउंड के पुरस्कार के लिए चुने जाने वाली पहली हिंदी भाषा की किताब है।
टॉम्ब ऑफ सैंड’ लेखिका गीतांजलि श्री के मूल हिंदी उपन्यास ‘रेत समाधि’ का ट्रांसलेट है। ‘रेत समाधि’ एक 80 साल की एक बूढ़ी औरत की कहानी है |

इंटरनेशनल बुकर प्राइज जीतकर देश को सम्मान दिलाने वाली गीतांजलि श्री के नाम से कोई अब अनजान नहीं है | उन्होंने देश को पहली बार ये प्राइज दिलाया है | उनके उन्यास रेत की समाधि जिसे अंग्रेजी में अनुवाद करके टॉम्ब ऑफ सैंड नाम दिया गया उसने इंटरनेशनल बुकर प्राइज का सम्मान प्राप्त किया है | सम्मान मिलने के बाद गीतांजलि ने कहा कि उन्होंने कभी बुकर प्राइज जीतने का सपना नहीं देखा था | उन्होंने कभी भी इसके बारे में सोचा भी नहीं था लेकिन ये सम्मान उनको मिला जिसकी खुशी वो बयां नहीं कर सकतीं, बहुत ही सम्मानित महसूस कर रही हैं | उनके हिंदी उपन्यास रेत की समाधि का अंग्रेजी में अनुवाद मशहूर लेखिका डेजी रॉकवेल ने किया है | उन्होंने इसे अंग्रेजी में टॉम्ब ऑफ सैंड के नाम से अनुवाद किया है | इसके लिए दोनों ही लोगों को सम्मानित किया गया है |
कौन हैं गीतांजलि श्री?
हिंदी साहित्य में गीतांजलि श्री बहुत पुराना नाम है | गीतांजलि मूल रुप से उत्तर प्रदेश की रहने वाली हैं | उनका जन्म मैनपुरी जिले में साल 1957 में हुआ था | फिलहाल वो दिल्ली में रहती हैं | उनको गीतांजलि पांडेय नाम से भी जाना जाता है | उन्होंने अपनी मां के पहले नाम श्री को अपने नाम से जोड़ लिया और वो गीतांजलि श्री के नाम से हिंदी साहित्य में फेमस हो गईं | गीतांजलि ने कई शार्ट स्टोरीज के अलावा 5 नॉवेल भी लिखे हैं | उनका पांचवा नॉवेल रेत समाधि है जिसे इंटरनेशनल बुकर प्राइज मिला है | इस उपन्यास का अंग्रेजी के अलावा फ्रेंच भाषा में भी अनुवाद किया है | उन्होंने अपना पहला उपन्यास माई के नाम से लिखकर साहित्य की दुनिया में कदम रखा था | गीतांजलि के उपन्यासों का अंग्रेजी और फ्रेंच के अलावा जर्मन, सर्बियन और कोरियाई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है |
Date : 27-May-2022
Penned by Reeta Joshi