9 पुलिसकर्मियों को क्यों सुनाई गई फांसी की सजा,हेड कांस्टेबल रेवती की गवाही बनी मिसाल !

9 पुलिसकर्मियों को क्यों सुनाई गई फांसी की सजा,हेड कांस्टेबल रेवती की गवाही बनी मिसाल !
By New31 Uttarakhand

तमिलनाडु के थूथुकुडी जिले के सथानकुलम में जून 2020 में हुई पिता-पुत्र की कस्टोडियल मौत का मामला देश की न्याय व्यवस्था और पुलिस सिस्टम पर गहरे सवाल खड़े करने वाला साबित हुआ था। अब इस मामले में 6 साल बाद एक अहम फैसला सामने आया है। 6 अप्रैल को मदुरै की अदालत ने इस केस में शामिल 9 पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराते हुए उन्हें फांसी की सजा सुनाई। यह फैसला न केवल पीड़ित परिवार के लिए न्याय की दिशा में एक बड़ा कदम है, बल्कि पूरे देश के लिए एक मजबूत संदेश भी है कि कानून से ऊपर कोई नहीं।इस पूरे मामले में हेड कांस्टेबल रेवती (43) की भूमिका सबसे निर्णायक रही। उनकी ईमानदार और साहसिक गवाही ने केस की दिशा बदल दी। दो बेटियों की मां रेवती ने न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने साफ कहा था कि वह सच्चाई सामने लाने के लिए तैयार हैं, लेकिन इसके बदले उन्हें अपने बच्चों और नौकरी की सुरक्षा चाहिए।

उनका यह कदम न सिर्फ बहादुरी का प्रतीक है, बल्कि यह भी दिखाता है कि सिस्टम के भीतर रहकर भी सच के लिए आवाज उठाई जा सकती है।घटना उस समय की है जब देश कोविड-19 लॉकडाउन से जूझ रहा था। पी. जयराज और उनके बेटे जे. बेनिक्स को सिर्फ इसलिए पुलिस हिरासत में लिया गया था क्योंकि उन्होंने अपनी मोबाइल दुकान तय समय से कुछ देर अधिक खुली रखी थी। लेकिन यह मामूली आरोप एक भयावह त्रासदी में बदल गया।रेवती ने अदालत में बताया कि जब वह रात करीब 8:50 बजे पुलिस स्टेशन पहुंचीं, तो अंदर से दर्दनाक चीखें सुनाई दे रही थीं। कोई व्यक्ति बार-बार गुहार लगा रहा था—“अम्मा, दर्द हो रहा है, मुझे जाने दो।” उनकी गवाही के अनुसार, पुलिसकर्मी दोनों के साथ बेरहमी से मारपीट कर रहे थे।

उन्हें इतना पीटा गया कि वे बुरी तरह घायल हो गए। यहां तक कि उनके निजी अंगों पर भी हमला किया गया।रेवती ने यह भी बताया कि जब दोनों की हालत बेहद गंभीर हो गई थी, तब उन्होंने मानवता के नाते जयराज को कॉफी देने की कोशिश की, लेकिन अन्य पुलिसकर्मियों ने उसे छीनकर फेंक दिया। इस दौरान आरोपी पुलिसकर्मी बीच-बीच में शराब पीने के लिए रुकते और फिर मारपीट जारी रखते थे।उनकी विस्तृत और क्रमबद्ध गवाही ने अदालत के सामने पूरे घटनाक्रम को स्पष्ट कर दिया। यह साबित हुआ कि थाने के अंदर क्या हुआ और कौन इसके लिए जिम्मेदार था। उनकी गवाही इस केस की रीढ़ साबित हुई।इस घटना के बाद पूरे देश में आक्रोश फैल गया था। सुप्रीम कोर्ट ने भी कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि हिरासत में मौतें न्याय व्यवस्था पर एक गंभीर धब्बा हैं और इन्हें किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को थानों में CCTV कैमरे लगाने और उनकी निगरानी सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए।सथानकुलम कस्टोडियल डेथ केस आज केवल एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि न्याय, मानवाधिकार और पुलिस जवाबदेही का प्रतीक बन चुका है। 6 साल बाद आया यह फैसला जहां पीड़ित परिवार को कुछ हद तक न्याय दिलाता है, वहीं यह भी याद दिलाता है कि सच और साहस के सामने अन्याय ज्यादा देर तक टिक नहीं सकता।

Related News

मनोरंजन

News Letter

Your email address will not be this published. Required fields are News Today.