उत्तराखंड में बिच्छू घास बनेगी स्वरोजगार का माध्यम, जानिए कैसे

By New31 Uttarakhand

वैसे तो यह भारत के विभिन्न राज्यों में मिलती है लेकिन, खास तौर पर उत्तराखंड में यह बहुतायत में पाई जाती है। यह एक प्रकार की घास होती है, जिसके संपर्क में आते ही शरीर में एक अजीब सी झनझनाहट होती है, तेज खुजली के साथ दर्द भी महसूस होता है। इसे लोग छूने से भी परहेज करते हैं। इसके झनझनाहट व दर्द पैदा करने वाले गुण के चलते इसे बिच्छू घास कहा जाता है |

बिच्छु घास के फायदे अनेक

बिच्छू घास का प्रयोग पित्त दोष, शरीर के किसी हिस्से में मोच, जकड़न और मलेरिया के इलाज में तो होता ही है, इसके बीजों को पेट साफ करने वाली दवा के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। माना जाता है कि बिच्छू घास में काफी आयरन होता है। इस पर जारी परीक्षण सफल रहे तो उससे जल्द ही बुखार भी भगाया जा सकेगा।

बिच्छू घास का वैज्ञानिक नाम अर्टिका पर्वीफ्लोरा है। अंग्रेजी में इसे scorpion grass कहा जाता है। इसकी पत्तियों पर छोटे-छोटे कांटे होते हैं, जो संपर्क में आते ही किसी बिच्छू के डंक की तरह शरीर में लगते है। खुली त्वचा से छू जायें तो लोगों की आह निकल आती है। इससे होने वाला दर्द काफी समय तक रहता है, लेकिन स्थायी नहीं होता। कहते हैं कि अगर कहीं यह घास लग जाये तो उस जगह को कंबल से रगड़ने में आराम मिलता है। पहाड़ों में इस घास का प्रयोग मोच आने पर किया जाता है। कई प्रकार की आयुर्वेदिक दवाओं में इसका इस्तेमाल होता है। कुछ लोग इसकी सब्जी भी बड़े चाव से खाते हैं।

ग्रीन हिल्स ट्रस्ट द्वारा बिच्छू घास पर किया जा रहा कार्य

नेशनल मिशन ऑन हिमालयन स्टडीस के तहत पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार के वित्त पोषण से ग्रीन हिल्स ट्रस्ट द्वारा “उत्तराखंड में जंगली पोधे बिच्छू बूटी की आजीविका संवर्धन की क्षमता की तलाश” का कार्य किया जा रहा है। जिसके तहत संस्था द्वारा बिच्छू घास के उत्पाद विकास के कार्य किए जा रहे हैं।

हैदराबाद स्थित नेशनल कोमोडिटीस मैनेजमेंट सर्विसेज लिमिटेड’ एवं गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर का भी इस प्रोजेक्ट में सहयोग लिया जा रहा है। ग्रीन हिल्स ट्रस्ट की सचिव डा. वसुधा पंत प्रोजेक्ट की मुख्य वैज्ञानिक एवं को-ऑर्डिनेटर हैं। उन्हीं की निगरानी में प्रोजेक्ट पर कार्य चल रहा है। प्रोजेक्ट का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य गांवों में जाकर बिच्छू बूटी (जिसे स्थानीय भाषा में सिसूण कहते हैं) की उपयोगिता को बताना है और इसके उत्पाद निर्मित कर स्वरोजगार का साधन बनाने के लिए प्रेरित करना है। बूटी से निर्मित खाद्य पदार्थों को राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलाना है |

ग्रीन हिल्स ट्रस्ट की सचिव डा वसुधा पंत इस प्रोजेक्ट की मुख्य वैज्ञानिक एवं को-ऑर्डिनेटर हैं जिनकी निगरानी में इस प्रोजेक्ट पर पूर्ण रूप से कार्य किया जा रहा है। 

इस प्रोजेक्ट का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य गांवों में जाकर बिच्छू बूटी (शिशुणे) की उपयोगिता को बताना और साथ ही इसके द्वारा निर्मित प्रोडक्टस की जानकारी देकर लोगों को इससे स्वरोजगार के लिए प्रेरित करना है। साथ ही कहा की इस परियोजना के साथ हमारा एवं मिशन का उद्देश्य है की पोषण से परिपूर्ण बिच्छू बूटी (शिशुण) से निर्मित खाद्य पदार्थों को राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलाई जा सके जिससे पर्वतीय वासियों को आजीविका का साधन मिले। 

Date : 24-May-2022

Penned by Reeta Joshi

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