सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को स्पष्ट शब्दों में कहा कि अगर केंद्र सरकार की ओर से जजों के ट्रांसफर के लिए सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिशों पर विचार करने में और देरी होती है तो वह ‘अप्रिय’ न्यायिक और साथ ही प्रशासनिक कार्रवाई करने के लिए विवश होगा।

जस्टिस एस के कौल और जस्टिस ए एस ओक ने पिछली सुनवाई में मौखिक रूप से कहा था,
“स्थानांतरण के लिए दस सिफारिशें की गई हैं। ये सितंबर के अंत और नवंबर के अंत में की गई हैं। इसमें सरकार की बहुत सीमित भूमिका है। उन्हें लंबित रखने से बहुत गलत संकेत जाता है। यह कॉलेजियम को अस्वीकार्य है।

स्थानांतरित न्यायाधीशों की टिप्पणियां भी प्राप्त की जाती हैं। कभी-कभी, संबंधित न्यायाधीश के अनुरोध पर, स्थानांतरण के लिए वैकल्पिक अदालतें भी सौंपी जाती हैं। सरकार को सिफारिश किए जाने से पहले यह प्रक्रिया पूरी की जाती है। इसमें देरी, न केवल न्यायाधीशों के प्रशासन को प्रभावित करती है, बल्कि सरकार के साथ इन न्यायाधीशों की ओर से हस्तक्षेप करने वाले तीसरे पक्ष के सूत्रों की छाप भी बनाती है।”
हाईकोर्ट के न्यायाधीशों के स्थानांतरण के संबंध में कॉलेजियम द्वारा की गई सिफारिशें लंबित हैं। जवाब में, जस्टिस कौल ने अपनी नाराजगी व्यक्त की, और कहा कि नई नियुक्तियों के लिए सिफारिश को लंबित रखने की तुलना में स्थानांतरण आदेशों को टालना अधिक गंभीर उल्लंघन है। उन्होंने संकेत दिया कि किसी भी तरह की देरी के परिणामस्वरूप न्यायालय ऐसा निर्णय ले सकता है, जो केंद्र के लिए ‘असहज’ हो सकता है।