मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध अब धीरे-धीरे बड़ा रूप लेता जा रहा है। अमेरिका और इजरायल के साथ बढ़ते टकराव के बीच ईरान को रूस का अप्रत्यक्ष समर्थन मिलने की खबरों ने वैश्विक चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बड़े देशों की भागीदारी इसी तरह बढ़ती रही तो यह संघर्ष लंबा भी खिंच सकता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक रूस सीधे तौर पर युद्ध में शामिल नहीं है, लेकिन वह ईरान को अहम खुफिया जानकारी दे रहा है। बताया जा रहा है कि रूस, समुद्र में छिपे अमेरिकी जहाजों के साथ-साथ आसमान में उड़ रहे लड़ाकू विमानों की लोकेशन से जुड़ी जानकारी ईरान को उपलब्ध करा रहा है। इससे ईरान को हमले के लिए सटीक टारगेट मिल रहे हैं।
अमेरिका के रक्षा मंत्री पीट Hegseth ने मीडिया ब्रीफिंग के दौरान कहा कि यह मानना गलत होगा कि इस संघर्ष में रूस और चीन की कोई भूमिका नहीं है। उनके मुताबिक रूस अप्रत्यक्ष रूप से इस जंग में शामिल है और अपने रणनीतिक सहयोगी ईरान को सैन्य गतिविधियों से जुड़ी खुफिया जानकारी दे रहा है। इन्हीं सूचनाओं के आधार पर ईरान अरब देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमले कर रहा है।विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान की अपनी खुफिया एजेंसी इतनी मजबूत नहीं मानी जाती कि वह अकेले इतनी सटीक सैन्य जानकारी जुटा सके। ऐसे में रूस से मिलने वाली जानकारी ईरान की रणनीति को मजबूत बना रही है।अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार मानते हैं कि अगर इस संघर्ष में अमेरिका, इजरायल, ईरान के साथ-साथ रूस और चीन जैसे बड़े देश किसी भी रूप में सक्रिय रहते हैं, तो यह युद्ध लंबे समय तक चल सकता है। मिडिल ईस्ट पहले ही कई वर्षों से तनाव का केंद्र रहा है और अब बड़े देशों के जुड़ने से स्थिति और जटिल हो सकती है।
अगर युद्ध लंबा चलता है तो इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था, तेल की कीमतों और वैश्विक व्यापार पर भी पड़ सकता है।इस युद्ध का असर भारत पर भी पड़ सकता है। सबसे बड़ा असर कच्चे तेल की कीमतों पर देखने को मिल सकता है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा मिडिल ईस्ट से तेल आयात करता है। अगर युद्ध बढ़ता है और तेल आपूर्ति प्रभावित होती है तो पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है।इसके अलावा मिडिल ईस्ट में लाखों भारतीय काम करते हैं। अगर युद्ध और तेज होता है तो वहां काम कर रहे भारतीयों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता बढ़ सकती है।विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह टकराव बढ़ता गया और इसमें और बड़े देश खुलकर शामिल हो गए, तो यह केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रहेगा बल्कि वैश्विक तनाव का कारण बन सकता है। फिलहाल दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि आने वाले दिनों में यह युद्ध किस दिशा में आगे बढ़ता है।