जानिए पेशावर कांड के नायक वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली की कहानी

By New31 Uttarakhand

वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली एक ऐसा नाम है जिस नाम को भारतीय इतिहास में पेशावर कांड के नायक के रूप में याद किया जाता है।बता दें की हवलदार मेजर चन्द्र सिंह गढवाली के नेतृत्व में रॉयल गढवाल राइफल्स के जवानों ने भारत की आजादी के लिये लड़ने वाले निहत्थे पठानों पर गोली चलाने से मना कर दिया था। और बिना गोली चले, बिना बम फटे पेशावर में इतना बड़ा धमाका हो गया कि एकाएक अंग्रेज भी हक्के-बक्के रह गये, उन्हें अपने पैरों तले जमीन खिसकती हुई सी महसूस होने लगी।चलिए जानते वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली के इतिहास के कुछ पन्नो की गाथा …23 अप्रैल 1930.में पेशावर के सदर बाजार के काबुली गेट पर पठानों की भारी भीड़ लगी हुई थी. सबके चेहरों पर एक शिकन थी,बता दें की उस समय पेशावर के माहौल में तनाव और कुछ अनचाहा हो जाने का डर पसरा हुआ था. चौराहे के दूसरी ओर अभी-अभी एक गोरे सार्जेंट पर किसी ने पेट्रोल की बोतल दे मारी थी. वो सार्जेंट जब जलने लगा तो वहां तैनात अंग्रेज़ अधिकारी कैप्टन रिकेट ने सिपाहियों को उसे बचाने का आदेश दिया. लेकिन कोई भी भारतीय सिपाही आगे नहीं बढ़ा. उल्टा सभी सिपाहियों ने मुँह फेर लिया. सार्जेंट जब जल कर मर गया, तो ग़ुस्से से तमतमाए कैप्टन रिकेट ने चार जवानों को बुरी तरह धक्का मारते हुए आदेश दिया, ‘जाओ उसे ले आओ.’ सिपाही मौके पर पहुंचे और गोरे सार्जेंट को खींच लाए.

वहीं इस घटना के बाद पेशावर के पठान ये भांप चुके थे कि अंग्रेजी हुकूमत इस हत्या का बदला ज़रूर लेगी. पठानों की ये आशंका अगले कुछ घंटों में ही सही भी साबित होने वाली थी. अंग्रेजों ने रॉयल गढ़वाल राइफ़ल्ज़ की पूरी ब्रिगेड को पेशावर के चप्पे-चप्पे में तैनात कर दिया. मंसूबे ये थे कि जब गढ़वाली सिपाही निहत्थे पठानों पर गोली चलाएंगे तो इससे हुकूमत को दो फायदे होंगे. पहला ये कि पठानों का जनसंहार हुकूमत के ख़िलाफ़ उठने वाली हर आवाज़ को ख़ौफ़ज़दा कर देगा और दूसरा ये कि हिंदू सिपाहियों द्वारा पठानों पर चली गोलियां दो धर्मों के बीच बन रही नफरत की खाई को और भी चौड़ा कर देगी.और अंग्रेज अधिकारियों ने गढ़वाल रेजिमेंट की प्लाटून चार को पठानों के नरसंहार के लिये चुना. इस प्लाटून की कमान एक ऐसे गढ़वाली सूबेदार के हाथ में थी, जो कुछ मिनट बाद ही पूरी अंग्रेजी सल्तनत की जमीन हिलाने वाला था, जो पूरी दुनिया के क्रांतिकारियों के लिए एक आदर्श बनने वाला था, जिसका नाम स्वतंत्रता आंदोलन में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज होने वाला था और जो कुछ साल बाद आज़ाद भारत की एक गुलाम रियासत में पहली क्रांति का नेतृत्व करने वाला था. और ये नाम वीर चंद्र सिंह भंडारी, जिन्हें इतिहास ने चंद्र सिंह गढ़वाली के रूप में याद रखा जाता है उन्ही का था .

बता दें की इसके बाद इनको पेशावर कांड का नायक माना जाने लगा।लेकिन अंग्रेजों की आज्ञा न मानने के कारण इन सैनिकों पर मुकदमा चला। गढ़वाली सैनिकों की पैरवी मुकुन्दी लाल द्वारा की गयी जिन्होंने कई प्रयासों के बाद इनके मृत्युदंड की सजा को कैद की सजा में बदल दिया। इस दौरान चन्द्रसिंह गढ़वाली की सारी सम्पत्ति ज़प्त कर ली गई और इनकी वर्दी को इनके शरीर से काट-काट कर अलग कर दिया गया।1930 में चन्द्रसिंह गढ़वाली को 14 साल के कारावास के लिये जेल में भेज दिया गया। जिसके बाद इन्हें अलग-अलग जेलों में कैद किया जाता रहा। पर इनकी सज़ा कम हो गई और 11 साल के कारावास के बाद इन्हें 26 सितम्बर 1941 को आजाद कर दिया। 8 अगस्त 1942 के भारत छोड़ों आंदोलन में इन्होंने इलाहाबाद में रहकर इस आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई और फिर से 3 तीन साल के लिये गिरफ्तार हुए, और 1945 में इन्हें आजाद कर दिया गया।

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