उत्तराखंड विधानसभा का बजट सत्र 9 मार्च से शुरू हुआ और पांच दिन तक चला। इस सत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की सक्रिय मौजूदगी रही। कुल मिलाकर लगभग 41 घंटे 10 मिनट तक सदन में बहस और कार्यवाही हुई। इस दौरान चार अध्यादेश और बारह विधेयक सदन में पेश किए गए, जिनमें से कई पारित भी हुए। साथ ही सरकारी संकल्प, नियमों के तहत प्रस्ताव, याचिकाएं और ध्यानाकर्षण प्रस्तावों पर भी चर्चा हुई। हालांकि, इस सत्र के दौरान कई बार बहस इतनी लंबी और रुक-रुक कर चली कि सदन का समय कई मौकों पर व्यर्थ लग रहा था। पांच दिन का यह सत्र कितनी गंभीरता से जनता की समस्याओं को सुन पाया, यह बड़ा सवाल है।
आम जनता की उम्मीद थी कि उनके रोजमर्रा के मुद्दों, विकास योजनाओं और वित्तीय नीतियों पर ठोस चर्चा होगी, लेकिन कई बार बहसें औपचारिकताओं और शब्दों में ही अटक गईं। लोगों का भरोसा इस सत्र से डगमगाया है। सवाल उठता है कि क्या सिर्फ पांच दिन में विधानसभा प्रदेश की नागरिकों की उम्मीदों और समस्याओं को सही तरह से समझ और हल कर सकती है? वित्तीय और नीति संबंधी निर्णय जरूर लिए गए, लेकिन कई मुद्दे ऐसे रह गए जिन्हें सुनने और सुलझाने की जरूरत थी। अब यह विचार जनता के सामने है – क्या यह बजट सत्र प्रदेश के नागरिकों की अपेक्षाओं पर खरा उतरा, या सिर्फ लंबी बहसों और औपचारिकताओं में समय निकल गया?