मध्य पूर्व में बढ़ते युद्ध संकट का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजार पर साफ दिखाई देने लगा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेंचमार्क Brent Crude Oil की कीमतें ट्रेडिंग के दौरान 94.51 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं, जो पिछले लगभग 30 महीनों यानी ढाई साल का उच्चतम स्तर है। इससे पहले 18 सितंबर 2023 के आसपास ही तेल की कीमतें इस स्तर के करीब देखी गई थीं। हालांकि 94.51 डॉलर का स्तर छूने के बाद कीमतों में हल्की गिरावट भी दर्ज की गई, लेकिन बाजार में अस्थिरता बनी हुई है।
8 दिनों में 35% की ऐतिहासिक तेजी
कच्चे तेल की कीमतों में आई यह तेजी केवल एक सामान्य उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक उछाल मानी जा रही है। पेट्रोलियम मंत्रालय के Petroleum Planning and Analysis Cell की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, Indian Basket की औसत कीमत 5 मार्च 2026 को बढ़कर 93.41 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई।
हैरानी की बात यह है कि फरवरी 2026 में भारतीय बास्केट की औसत कीमत केवल 69.01 डॉलर प्रति बैरल थी। यानी महज 8 दिनों के भीतर कच्चे तेल की कीमतों में करीब 35.35% की जबरदस्त बढ़ोतरी दर्ज की गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि मध्य पूर्व में युद्ध के कारण सप्लाई चेन में आई बाधाओं ने वैश्विक तेल बाजार को बुरी तरह प्रभावित किया है, जिससे कीमतों में अचानक उछाल देखने को मिला।
आम आदमी तक पहुंच सकती है महंगाई की मार
तेल की कीमतों में तेजी का असर केवल अंतरराष्ट्रीय बाजार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ता है। पेट्रोल, डीजल, गैस और परिवहन लागत में बढ़ोतरी के कारण महंगाई बढ़ने की आशंका भी तेज हो जाती है।
भारत के लिए क्यों चिंता का विषय?
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में हर एक डॉलर की बढ़ोतरी भारत के आयात बिल को हजारों करोड़ रुपये तक बढ़ा सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि कच्चे तेल की कीमतों में आया यह 35% का उछाल भारत के Import Bill, व्यापार घाटे और विदेशी मुद्रा भंडार पर सीधा दबाव डाल सकता है। यदि मध्य पूर्व में तनाव लंबे समय तक जारी रहता है, तो इसका असर भारत की अर्थव्यवस्था, महंगाई दर और आम उपभोक्ताओं के खर्च पर भी साफ दिखाई दे सकता है।
आर्थिक जानकारों के अनुसार, आने वाले दिनों में वैश्विक स्थिति और सप्लाई की स्थिति पर निर्भर करेगा कि कच्चे तेल की कीमतें स्थिर होंगी या और अधिक बढ़ोतरी देखने को मिलेगी। फिलहाल तेल बाजार में बनी यह अस्थिरता सरकारों और उपभोक्ताओं दोनों के लिए चिंता का विषय बन गई है।