“मैती आंदोलन” पर्यावरण संरक्षण की ऐसी परंपरा, जिसमें वर-वधू विदाई से पहले करते हैं ये पवित्र काम

By New31 Uttarakhand

मैती एक भावनात्मक पर्यावरण आन्दोलन है | उत्तराखंड में इस मुहिम की शुरुआत 1994 में चमोली जनपद के राजकीय इंटर कालेज ग्वालदम के जीव विज्ञान के प्राध्यापक कल्याण सिंह रावत ने की थी | ‘मैती’ यानि शादी के समय दूल्हा-दुल्हन द्वारा फलदार पौधों का रोपण। मैती शब्द का अर्थ होता है मायका, यानि जहां लड़की जन्म से लेकर शादी होने तक अपने मां-बाप के साथ रहती है। जब उसकी शादी होती है, तो वह ससुराल अपने मायके में गुजारी यादों के साथ-साथ विदाई के समय रोपित पौधे की मधुर स्मृति भी ले जाती है।

पर्यावरण को बचाने के लिए टिहरी जिले के ग्राम सभा बनाली के कुछ युवाओं ने कल्याण सिंह जी द्वारा चलाए गए मैती आंदोलन प्रथा की राह पकड़ ली है । जब भी गांव में किसी भी लड़की की शादी हो तो लड़की विदाई के वक़्त अपने मायके (मैत) में एक फलदार वृक्ष लगाकर अपने ससुराल जाती है और वृक्ष के संरक्षण की जिम्मेदारी अपने मायके वालों को दे जाती है | जोड़े द्वारा लगाया गया वृक्ष उनको उनकी शादी का दिन याद दिलाएगा और बहुत सारी भावनात्मक बाते भी जुड़ी होंगी। इस प्रकार से लगाए गए वृक्ष पर मैती पक्ष और दुल्हन दोनों का भावनात्मक लगाव रहेगा, जिस कारण पेड़ का संरक्षण अच्छे से हो सकता है।

गांव में यह पहल शुरू करने वाले युवाओं में युद्धवीर, संदीप, महेंद्र, कुलवीर और संजय जिन्होंने हाल में ही दो शादियों में दूल्हा – दुल्हन से पेड़़ लगवाए और युवाओं ने संगठन को बड़ा बनाने की बात भी कही | ताकि अन्य गांवो में भी ऐसा कार्य हो और पर्यावरण का संरक्षण किया जा सके । युवाओं द्वारा गांव में चलाए गए मैती आंदोलन की मुहिम को आगे बढ़ाते हुए, प्रेम पौधे का रोपण किया ,जो पर्यावरण संरक्षण के साथ – साथ उनके प्रेम, विवाह की खूबसूरत यादों को भी संरक्षित रखेगा और उन्हें समय – समय पर उनके विवाह के खूबसूरत पलों की याद दिलाएगा | जब् लोग भावानात्मक रूप से वृक्षा रोपण से जुड़ेंगे तो वो खुद् ही उन वृक्षों कि रक्षा करेंगे इस पहल से एक तरफ जहाँ पर्यावरण को  संरक्षण मिलेगा  तो वही रिश्तों मे भी नएपन का एहसास होता रहेगा |

Date : 6-मई-2022

Penned by Reeta Joshi

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