देशभर में इन दिनों गुजरात हाईकोर्ट का एक पुराना मामला चर्चा में है। यह केस एक पति द्वारा पत्नी को थप्पड़ मारने से जुड़ा था, जो करीब 30 साल से अदालत में लंबित था। हाल ही में हाईकोर्ट ने इस मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए पति को राहत दे दी और निचली अदालत द्वारा दी गई सजा को रद्द कर दिया।यह मामला वर्ष 1996 का बताया जा रहा है। याचिकाकर्ता पति दिलीपभाई मंगलाभाई वरली ने अदालत में कहा था कि उनकी पत्नी बिना बताए बार-बार मायके चली जाती थी, जिससे परिवार में तनाव रहता था। एक दिन इस बात को लेकर दोनों के बीच विवाद हुआ और गुस्से में पति ने पत्नी को एक थप्पड़ मार दिया।इसके बाद पत्नी ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।
निचली अदालत ने पति को दोषी मानते हुए 7 साल की सजा सुना दी थी। मामला लंबे समय तक अदालत में चलता रहा।पत्नी की ओर से आरोप लगाया गया कि पति रोजाना मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना देता था। उसके साथ नियमित रूप से मारपीट होती थी। आरोप यह भी था कि लगातार प्रताड़ना से परेशान होकर पत्नी ने आत्महत्या कर ली और इसके लिए पति जिम्मेदार है।बताया गया कि पति रात में बैंजो बजाने जाता था, जिसे लेकर घर में विवाद होता था और बात मारपीट तक पहुंच जाती थी।मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति गीता (Justice Geeta) ने कहा कि केवल एक थप्पड़ मारने की घटना को स्वतः “क्रूरता” नहीं माना जा सकता, जब तक कि उसे साबित करने के लिए ठोस और विश्वसनीय सबूत न हों।अदालत ने यह भी माना कि निचली अदालत को सजा सुनाते समय सबूतों पर गहराई से विचार करना चाहिए था।
पर्याप्त प्रमाण के अभाव में हाईकोर्ट ने पति को बरी कर दिया और 7 साल की सजा को रद्द कर दिया।यह मामला तीन दशक तक अदालत में चलता रहा। इस दौरान दोनों पक्षों की जिंदगी पर गहरा असर पड़ा। कानूनी लड़ाई ने परिवार को सामाजिक, मानसिक और आर्थिक रूप से प्रभावित किया।यह फैसला इसलिए सुर्खियों में है क्योंकि अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी आरोप को साबित करने के लिए ठोस सबूत जरूरी हैं। साथ ही, यह मामला वैवाहिक विवाद, घरेलू हिंसा और न्याय प्रक्रिया की लंबी अवधि जैसे मुद्दों पर भी बहस को जन्म दे रहा है।फिलहाल, हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद यह मामला कानूनी और सामाजिक दोनों स्तरों पर चर्चा का केंद्र बना हुआ है।