संसद की शक्ति किसी के अधीन नहीं
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने 1973 के चर्चित केशवानंद भारती केस का जिक्र किया है. उन्होंने कहा कि इस फैसले ने गलत मिसाल पेश कर दी है और अगर कोई भी अथॉरिटी संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति पर सवाल उठाती है, तो यह कहना मुश्किल होगा कि ‘हम एक लोकतांत्रिक राष्ट्र हैं.

‘मूल संरचना सिद्धांत नहीं है गलत’
चिदंबरम ने अपने ट्वीट में ये भी कहा कि मान लीजिए कि संसद ने बहुमत से संसदीय प्रणाली को राष्ट्रपति प्रणाली में बदलने के लिए मतदान किया। या अनुसूची VII में राज्य सूची को निरस्त करे और राज्यों की अनन्य विधायी शक्तियां छीन लें। क्या ऐसे संशोधन मान्य होंगे? इसके अलावा चिदंबरम ने तर्क दिया कि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) अधिनियम को रद किए जाने के बाद सरकार को नया विधेयक पेश करने से कोई नहीं रोक सकता। उन्होंने कहा कि एक अधिनियम को खत्म करने का मतलब ये नहीं है कि मूल संरचना सिद्धांत गलत है।
केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य – 7:6 के मामूली बहुमत से यह माना गया कि संसद संविधान के किसी भी भाग में संशोधन उस हद तक ही कर सकती है जहाँ तक कि वो संसोधन संविधान के बुनियादी ढांचे और आवश्यक विशेषताओं में परिवर्तन या संशोधन नहीं करे।

सतर्क रहने की चेतावनी-
चिदंबरम ने कहा कि वास्तव में, माननीय सभापति के विचारों को प्रत्येक संविधान प्रेमी नागरिक को आने वाले खतरों के प्रति सतर्क रहने की चेतावनी देनी चाहिए। धनखड़ ने बुधवार को कहा था कि लोकतांत्रिक समाज में किसी भी ‘मूल ढांचे’ का ‘मूल’ लोगों के जनादेश की सर्वोच्चता होना चाहिए। इस प्रकार, संसद और विधायिका की प्रधानता व संप्रभुता अनुल्लंघनीय है।