उत्तराखंड घूमने आते हैं हजारों लोग… लेकिन पहाड़ों पर पहुंचते ही जाम में फंसकर बेहाल हो जाते हैं!उत्तराखंड की खूबसूरत वादियां, ठंडा मौसम और धार्मिक स्थल हर साल देशभर से लाखों पर्यटकों और श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींचते हैं। लेकिन जैसे ही वीकेंड या लंबी छुट्टियां आती हैं, यही पर्यटन कई जगहों पर जाम और अव्यवस्था की बड़ी समस्या बन जाता है।
बारिश थमने के बाद मौसम सुहाना हुआ तो इस लॉन्ग वीकेंड पर बड़ी संख्या में पर्यटक पहाड़ों की तरफ निकल पड़े। इसका असर कुमाऊं और गढ़वाल दोनों मंडलों के प्रमुख पर्यटन स्थलों पर दिखाई दिया। सुबह से ही कई जगह सड़कों पर वाहनों की लंबी कतारें लग गईं और लोगों को घंटों जाम में फंसे रहना पड़ा।मसूरी में हालात सबसे ज्यादा परेशान करने वाले रहे। शुक्रवार से ही वाहनों का दबाव बढ़ गया था और शनिवार को स्थिति और बिगड़ गई।
माल रोड के भगत सिंह चौक, लाइब्रेरी चौक और किंग्रेग समेत कई इलाकों में घंटों जाम लगा रहा। हालात इतने खराब हुए कि जाम में एंबुलेंस तक फंस गई। स्थानीय लोगों के साथ-साथ पर्यटकों को भी घंटों सड़क पर इंतजार करना पड़ा।उधर कैंची धाम और भीमताल में भी पर्यटकों और श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिली। भीमताल से कैंची धाम के बीच कई घंटे तक ट्रैफिक प्रभावित रहा। इसका सीधा असर अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, रानीखेत, धारचूला, बागेश्वर और हल्द्वानी की ओर आने-जाने वाले लोगों पर पड़ा।
कई यात्रियों को तीन घंटे से ज्यादा समय जाम में बिताना पड़ा।गढ़वाल में भी स्थिति अलग नहीं रही। चारधाम यात्रा और हेमकुंड साहिब यात्रा के चलते ज्योतिर्मठ क्षेत्र में वाहनों का दबाव बढ़ गया। ज्योतिर्मठ से विष्णुप्रयाग तक करीब सात किलोमीटर लंबी वाहनों की कतार लगने की स्थिति सामने आई।अब सवाल ये है कि जब सरकार और प्रशासन को पहले से पता है कि वीकेंड, छुट्टियों और यात्रा सीजन में उत्तराखंड के पर्यटन स्थलों पर हजारों वाहन पहुंचते हैं, तो ट्रैफिक का दबाव कम करने के लिए स्थायी व्यवस्था क्यों नहीं तैयार की जा रही?हर बार छुट्टियां आती हैं, पर्यटकों की भीड़ बढ़ती है, सड़कें जाम होती हैं और फिर पुलिस रूट डायवर्जन और ट्रैफिक कंट्रोल में जुट जाती है।
लेकिन सवाल ये है कि क्या हर बार अस्थायी इंतजाम ही समाधान हैं?पर्यटन उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा है। ऐसे में जरूरत सिर्फ ज्यादा पर्यटक लाने की नहीं, बल्कि उनके लिए बेहतर सड़कें, पर्याप्त पार्किंग, पब्लिक ट्रांसपोर्ट और मजबूत ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम तैयार करने की भी है।क्योंकि अगर लोग पहाड़ों की खूबसूरती देखने आएं और उन्हें घंटों जाम में खड़ा रहना पड़े, एंबुलेंस तक रास्ते में फंस जाए और स्थानीय लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी भी प्रभावित हो, तो फिर सवाल सिर्फ ट्रैफिक का नहीं… पूरी पर्यटन व्यवस्था की तैयारी पर उठता है।