सपा प्रत्याशी शोएब अहमद के मैदान छोड़ने से जहां हल्द्वानी मेयर चुनाव में भाजपा की टेंशन बढ़ गयी है, तो वहीं कांग्रेस को राहत मिलती दिखाई दे रही है। आपको बता दे सपा से शोएब के मैदान में उतरने के बाद कांग्रेस को वोटों के बिखराव का अंदेशा था जबकि भाजपा इसे अपने पक्ष में मान रही थी। दरअसल बनभूलपुरा क्षेत्र में लगभग 40 हजार मतदाता हैं। पिछले चुनावों में हुए मतदान के आंकड़े को देखें तो यहां मतदान प्रतिशत करीब 70 फीसदी तक रहता है। हालांकि लंबे समय से बनभूलपुरा कांग्रेस का गढ़ रहा है इसलिए मेयर के लिए सपा प्रत्याशी के रूप में शोएब अहमद के नामांकन के बाद कांग्रेस के वोटों में सेंध लगने की आशंका थी, क्योंकि वर्ष 2018 में हुए नगर निगम चुनाव में मेयर प्रत्याशी रहे सपा नेता शोएब अहमद को इसी क्षेत्र से नौ हजार वोट मिले थे। तब कांग्रेस प्रत्याशी सुमित हृदयेश को भाजपा प्रत्याशी जोगेंद्र रौतेला से दस हजार वोटों से हार का मुंह देखना पड़ा था। इसलिए शोएब के नामांकन के बाद इस बार मेयर के मुकाबले में कांग्रेस को डैमेज हो सकता था।
हालांकि अब शोएब के इस चुनाव से हटने के बाद कांग्रेस और भाजपा की सीधी टक्कर के समीकरण बन गए हैं। कांग्रेस अब बनभूलपुरा को अपना एकमुश्त वोट बैंक के रूप में देख रही है जबकि भाजपा नई रणनीति बनाने में जुट गई है। दरअसल सपा प्रत्याशी के मैदान से हटने के पीछे इंडिया गठबंधन बताया जा रहा है। हालांकि सूत्र बताते हैं कि इस संबंध में कांग्रेस हाईकमान ने सपा नेता अखिलेश से बात की थी। हल्द्वानी विधायक सुमित हृदयेश और प्रत्याशी ललित जोशी भी शोएब को मनाने में जुटे हुए थे। जिसके बाद हल्द्वानी में कांग्रेस को मजबूत करने के लिए सपा ने किनारे होना ही बेहतर समझा। साथ ही शोएब ने कहा कि जनता की मांग पर उन्होंने अपना नाम वापस लिया है। लेकिन सपा के प्रदेश प्रभारी अब्दुल मतीन सिद्दीकी ने शोएब अहमद के नामांकन पत्र वापस लेने को पार्टी के साथ विश्वासघात करार दिया है। उनका कहना है की पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष से शोएब को पार्टी से निष्कासित कराने की मांग को लेकर पत्र भेजा जाएगा। आगे उन्होंने कहा की पर्चा वापस लेने को लेकर शोएब ने पार्टी के किसी भी बड़े पदाधिकारी अथवा उनसे कोई राय मशविरा नहीं किया। यहाँ तक की शोएब ने ऐसा फैसला क्यों लिया, इसकी जानकारी तक उन्हें नहीं है इसलिए ऐसे व्यक्ति को पार्टी में रहने का कोई अधिकार नहीं।